होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Sunday, 29 March 2026

डूबने की आदत और तैरने का भ्रम

 डूबने की आदत और तैरने का भ्रम”

मैं डूबता रहा

इतनी बार
कि डूबना
मेरी प्रकृति बन गया।

और हर बार
जब मैं ऊपर आया,
मैंने खुद से कहा
“देखो, मैं तैर रहा हूँ।”

पर यह तैरना नहीं था,
यह केवल
डूबने के बीच
एक छोटा-सा विराम था।

जल
शांत दिखता है,
पर उसकी गहराई में
एक अनकही खींच है,

जो हर उस चीज़ को
अपने भीतर समा लेना चाहती है
जो स्वयं को
स्थिर मान बैठती है।

मैंने जीवन को
एक सतह समझा,
जहाँ संतुलन बनाकर
रहा जा सकता है,

पर जीवन
सतह नहीं,
एक गहराई है,

जहाँ हर प्रयास
या तो डूबता है,
या डूबने से
क्षण भर बचता है।

मैंने हाथ-पैर मारे,
तकनीक सीखी,
दूसरों को देखा

वे भी
ठीक मेरी तरह
डूबते-उतराते थे,

पर उनके चेहरों पर
एक अजीब-सा विश्वास था,
जैसे वे सच में
तैरना जानते हों।

और मैं
उनकी नकल करता रहा,

अपने भीतर की सच्चाई को
अनदेखा करते हुए।

धीरे-धीरे
मुझे महसूस हुआ

कि यह सारा संघर्ष
जल से नहीं,
मेरी धारणा से है।

मैं मान बैठा था
कि मुझे तैरना है,
मुझे बचना है,
मुझे ऊपर रहना है

और यही चाह
मुझे
बार-बार नीचे खींचती रही।

एक दिन
मैं थक गया।

इतना थक गया
कि मैंने
संघर्ष करना छोड़ दिया।

मैंने
अपने हाथ-पैर रोक लिए,
और पहली बार
डूबने को
पूरा होने दिया।

वह अंत नहीं था

वह एक अजीब-सी
शांति थी,

जैसे जल ने
मुझे अपने भीतर
समेट लिया हो,

बिना किसी विरोध के।

और उसी क्षण
कुछ टूटा,

वह भ्रम
कि मैं कभी
तैर रहा था।

मैंने देखा

न मैं डूब रहा था,
न तैर रहा था,

मैं बस
उस अनुभव का हिस्सा था,

जिसे मैं
समझ नहीं पा रहा था।

जल
अब शत्रु नहीं था,
और मैं
अब उससे अलग नहीं था।

डूबने की आदत
धीरे-धीरे
घुलने लगी,

क्योंकि
अब कोई प्रयास नहीं था
जिसे बचाना हो।

और तैरने का भ्रम
वह तो
पहले ही
बिखर चुका था।

अब न ऊपर का डर,
न नीचे का मोह

बस
एक स्वीकार,
एक मौन,
एक सहज बहाव।

शायद यही
जीवन का वह बिंदु है,

जहाँ हम समझते हैं
कि संघर्ष ही
डूबना था,

और समर्पण
कोई तैरना नहीं,

बल्कि
उस जल के साथ
एक हो जाना है
जिसे हम
अब तक
जीवन कहते आए थे।


मुकेश ,,,,,

No comments:

Post a Comment