रात मेरे अंदर एक शहर जागता है
रात मेरे अंदर
एक शहर जागता है—
दिन भर का धुआँ
अब साफ़ दिखने लगता है।
सड़कें
अचानक तंग हो जाती हैं,
हर मोड़ पर
कोई अधूरा सवाल
खड़ा मिल जाता है।
दिन में
जिन बातों को
काम, लोगों और हँसी के बीच
छुपा दिया था,
रात उन्हें
पूरे हक़ के साथ
सामने ले आती है।
यहाँ
हड़बड़ाहट है—
बिना वजह,
बिना मंज़िल के।
जैसे
हर कोई
कहीं देर से
पहुँच रहा हो।
उदासी है,
मगर
आँसू नहीं हैं—
बस
सीने में
एक भारीपन है
जो उतरता नहीं।
बेकरारी है,
पर
कोई पुकार नहीं—
इंतज़ार है
बिना किसी के
आने की उम्मीद के।
इस शहर में
शोर बहुत है—
यादों का शोर,
अगर-मगर का शोर,
और उन बातों का शोर
जो कहे जाने से पहले
मर गईं।
कहीं
टूटी हुई उम्मीदें
फुटपाथ पर
बैठी हैं,
और मैं
हर रात
उन्हें पहचान कर भी
नज़र फेर लेता हूँ।
कुछ ख़्वाब
बंद दुकानों की तरह हैं—
शटर आधा गिरा हुआ,
नाम अब भी लिखा है,
मगर
अंदर
कुछ नहीं बचा।
इस शहर में
कोई साथ नहीं चलता,
सब
अपने-अपने
अँधेरे उठाए
घर लौट रहे हैं।
और मैं
खिड़की के पास
खड़ा होकर
अपने ही भीतर
जलती बत्तियों को देखता हूँ—
कुछ बुझती हुई,
कुछ टिमटिमाती।
सुबह होने से पहले
ये शहर
फिर सो जाएगा,
धुआँ
रोज़मर्रा में
घुल जाएगा।
मैं भी
दिन के उजाले में
खुद को
फिर से
साधारण बना लूँगा।
मगर
मुझे पता है—
रात फिर आएगी,
और मेरे अंदर
ये शहर
फिर जागेगा।
क्योंकि
कुछ शहर
नक़्शों पर नहीं होते,
वो
इंसान के अंदर
बसते हैं।
और वहाँ
रात
सबसे सच्चा
वक़्त होती है।
मुकेश्,,,
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