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Monday, 2 March 2026

वीराने शहर में रहता हूँ

 वीराने शहर में रहता हूँ

वीराने शहर में रहता हूँ,

जहाँ सड़कें तो हैं

मगर मंज़िलों की आदत

कब की छूट चुकी है।

यहाँ लोग मिलते हैं,

पर

आवाज़ें नहीं मिलतीं—

हर कोई

अपने-अपने भीतर

किसी उजड़े मकान में

रह रहा है।

मैं भी

इन्हीं गलियों से

रोज़ गुज़रता हूँ,

कंधों पर

दिन भर की थकान

और जेब में

कुछ टूटे हुए ख़्वाब लिए।

इस शहर में

रातें लंबी हैं,

और नींद

बहुत महँगी—

अक्सर

आँखों से पहले

यादें

सोने से इनकार कर देती हैं।

यहाँ

उम्मीदें

दीवारों पर लिखी इबारतों

जैसी हैं—

धूप, बारिश

सब सह लेती हैं,

मगर

पढ़ी नहीं जातीं।

मैंने

सीख लिया है

बिना शिकायत

जीना,

बिना सवाल

चलते रहना।

फिर भी

कभी-कभी

दिल पूछ बैठता है—

क्या यही शहर था

जिसका वादा

ख़्वाबों में किया गया था?

वीराने शहर में

रहना आसान नहीं,

मगर

यही सिखाता है

कि इंसान

जब सब खो देता है,

तभी

ख़ुद को

पहचानना शुरू करता है।

और मैं—

इसी पहचान के

उजड़े रास्ते पर

अब भी

चल रहा हूँ।

मुकेश्,,, 

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