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Wednesday, 18 March 2026

स्पर्श की धीमी रोशनी

 स्पर्श की धीमी रोशनी

तुम

जब पास होती हो

हवा का लहजा बदल जाता है,

जैसे किसी ख़ामोश सरगम ने

अचानक साँस ले ली हो।

तुम्हारी उँगलियों का हल्का-सा छूना

कोई साधारण स्पर्श नहीं

वो जैसे

रात की पेशानी पर

चाँद का पहला ख़्वाब उतरना हो।

मैंने देखा है—

तुम्हारी पलकों के किनारों पर

ठहरा हुआ एक अधूरा-सा मिलन,

जो हर बार

नज़र से नज़र मिलते ही

धीरे-धीरे पूरा होने लगता है।

तुम्हारी साँसों की आहट

मेरे क़रीब आकर

किसी अनकहे गीत में ढल जाती है

जहाँ शब्द नहीं होते,

सिर्फ़ एहसास होते हैं,

और वही

सबसे सच्चे होते हैं।

तुम्हारे होने में

कोई हड़बड़ी नहीं है

बस एक ठहराव है,

जिसमें

मेरा पूरा अस्तित्व

धीरे-धीरे घुलता चला जाता है।

और उस घुलने में

न कोई सीमा बचती है,

न कोई फ़ासला,

सिर्फ़

एक कोमल-सा मिलन,

जो हर बार

नई तरह से जन्म लेता है…


मुकेश्,,,, 

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