रसोई में एक औरत
सुबह की हल्की रोशनी
खिड़की से उतरकर
रसोई के फर्श पर फैल रही है,
और चूल्हे के सामने
एक औरत खड़ी है।
उसके हाथ
धीरे-धीरे
आटे को गूँध रहे हैं,
जैसे किसी पुराने गीत की
लय दोहरा रहे हों।
कड़ाही में
तेल की हल्की-सी आवाज़ है,
और भाप
धीरे-धीरे
छत की तरफ़ उठ रही है—
जैसे घर की खुशबू
आकाश तक जा रही हो।
वो औरत
बहुत कम बोलती है,
पर उसके हाथों में
एक अजीब-सी समझ है—
किस रोटी को
कितनी आँच चाहिए,
किस दाल में
कितना नमक।
उसकी उँगलियाँ
सिर्फ़ खाना नहीं बनातीं,
वे
घर की थकान को
धीरे-धीरे
नरम भी करती हैं।
कभी वो
चूल्हे की लौ को देखती है,
और एक पल को
जाने कहाँ खो जाती है—
शायद
किसी पुराने सपने में
जो रसोई की भाप में
अब भी तैरता रहता है।
रसोई में खड़ी
वो औरत
बस खाना नहीं बना रही
वो
हर दिन
इस घर की ज़िंदगी को
धीरे-धीरे
पकाकर
सबके हिस्से में बाँट रही है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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