होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Monday, 9 March 2026

रसोई में एक औरत

 रसोई में एक औरत


सुबह की हल्की रोशनी

खिड़की से उतरकर

रसोई के फर्श पर फैल रही है,

और चूल्हे के सामने

एक औरत खड़ी है।


उसके हाथ

धीरे-धीरे

आटे को गूँध रहे हैं,

जैसे किसी पुराने गीत की

लय दोहरा रहे हों।


कड़ाही में

तेल की हल्की-सी आवाज़ है,

और भाप

धीरे-धीरे

छत की तरफ़ उठ रही है—

जैसे घर की खुशबू

आकाश तक जा रही हो।


वो औरत

बहुत कम बोलती है,

पर उसके हाथों में

एक अजीब-सी समझ है—

किस रोटी को

कितनी आँच चाहिए,

किस दाल में

कितना नमक।


उसकी उँगलियाँ

सिर्फ़ खाना नहीं बनातीं,

वे

घर की थकान को

धीरे-धीरे

नरम भी करती हैं।


कभी वो

चूल्हे की लौ को देखती है,

और एक पल को

जाने कहाँ खो जाती है—

शायद

किसी पुराने सपने में

जो रसोई की भाप में

अब भी तैरता रहता है।


रसोई में खड़ी

वो औरत

बस खाना नहीं बना रही


वो

हर दिन

इस घर की ज़िंदगी को

धीरे-धीरे

पकाकर

सबके हिस्से में बाँट रही है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment