तुम्हारी साँसों की ख़ुशबू की तहरीर
तुम्हारी साँसों की ख़ुशबू में
जो तहरीर छिपी है,
मैं उसे पढ़ सकता हूँ
धीरे-धीरे,
जैसे कोई दरवेश
रात की ख़ामोशी में
किसी अनदेखी किताब के पन्ने पलट रहा हो।
मुझे मालूम है
उस महक में
कितनी अनकही बातें बसती हैं,
कितने मौसम
चुपचाप अपना रंग छोड़ जाते हैं।
मैं चाहूँ
तो उन खुशबुओं को
नज़्मों में ढाल सकता हूँ
शब्दों की रौशनी में रखकर
उन्हें एक नई आवाज़ दे सकता हूँ।
पर शायद
कविता की सबसे बड़ी विडम्बना यही है
कि कुछ तहरीरें
पढ़ी तो जा सकती हैं,
पर लिखी नहीं जा सकतीं।
और कुछ खुशबुएँ
समझी तो जा सकती हैं,
पर किसी किताब में
कैद नहीं की जा सकतीं।
यह भी सच है
कि तुम
अपनी महकती साँसों को
किसी को पढ़ने नहीं दोगी
क्योंकि
कुछ रहस्य
उसी वक़्त तक ख़ूबसूरत रहते हैं
जब तक वे
किसी की ख़ामोश साँसों में
छिपे रहते हैं।
और शायद
इसीलिए
मैं उन्हें पढ़ते हुए भी
कभी पूरी तरह लिख नहीं पाता।
मुकेश ,,,,,,,
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