इश्क़ का गुमशुदा क़ाफ़िला
इश्क़
कभी-कभी
किसी रेगिस्तान से गुज़रते
एक क़ाफ़िले जैसा होता है—
जो दूर से
धूल और रौशनी के बीच
धीरे-धीरे चलता दिखाई देता है।
कुछ रूहें
उसके साथ थोड़ी दूर तक चलती हैं,
कुछ
किसी मोड़ पर
अचानक बिछड़ जाती हैं।
किसी को
उसकी मंज़िल मिल जाती है,
और कोई
राह की तन्हाई में
ख़ुद को ढूँढने लग जाता है।
मगर अजीब बात है
इश्क़ का क़ाफ़िला
कभी पूरी तरह मिलता नहीं,
और कभी
पूरी तरह खोता भी नहीं।
वो बस
यादों के रेगिस्तान में
अपने निशान छोड़ता हुआ
आगे बढ़ जाता है।
और पीछे रह जाते हैं
कुछ अधूरे क़दम,
कुछ बुझती हुई शामें,
और दिल में उठती
एक धीमी-सी पुकार
कि शायद
किसी और सफ़र में
फिर कहीं
मिल जाए
वही
इश्क़ का गुमशुदा क़ाफ़िला
मुकेश ,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment