इश्क़ की नमकीन हवा
कभी-कभी
इश्क़
समुंदर की तरफ़ से आती
उस नमकीन हवा जैसा होता है
जो चेहरे को छूकर
चुपचाप गुज़र जाती है,
मगर दिल में
एक गहरी ताज़गी छोड़ जाती है।
उसमें
लहरों की बेचैनी भी होती है,
और दूर कहीं
डूबते सूरज की उदासी भी।
वो हवा
किसी को रोकती नहीं,
न ही किसी से
अपने होने का सबूत माँगती है
बस आती है,
रूह को छूती है
और फिर
किसी अनदेखे किनारे की तरफ़
चल देती है।
मगर उसके जाने के बाद भी
दिल की फिज़ा में
उसकी हल्की-सी महक
देर तक बनी रहती है।
शायद इसी लिए
इश्क़ को समझना
आसान नहीं
क्योंकि वो
किसी क़ैद में नहीं रहता,
वो तो बस
समुंदर से उठती
एक नमकीन हवा है
जो कभी
दिल को महका जाती है
और कभी
रूह को थोड़ा-सा
उदास भी कर जाती है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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