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Monday, 2 March 2026

बाकी रह गया

 बाकी रह गया

सब कुछ था 

एक साथ चलती धूप,

बरामदे में रखी दो कुर्सियाँ,

और शाम का धीमे-धीमे उतरना।


फिर भी जाने क्यों

कुछ बाकी रह गया।


तुम्हारी हँसी में शामिल था मैं,

पर उसकी वजह बनना

बाकी रह गया।


तुमने थामा था मेरा हाथ,

पर अपनी थकान का बोझ

मुझ पर रखना

बाकी रह गया।


हमने कितनी बातें कीं,

दिन, मौसम, दुनिया,

पर दिल के सबसे भीतर का कमरा

खोलना

बाकी रह गया।


तुम गए तो लगा —

विछोह नहीं,

एक अधूरा अध्याय चुभ रहा है।


प्रेम कम न था,

बस उसे पूरा जी लेना

बाकी रह गया।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,


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