शहर के भीतर एक ख़ाली कमरा
शहर के भीतर
एक ख़ाली कमरा है—
भीड़ से घिरा हुआ,
मगर
आवाज़ों से आज़ाद।
खिड़की से
ट्रैफ़िक का शोर आता है,
लोगों की ज़िंदगियाँ
तेज़ी से गुज़रती हैं,
और कमरे के भीतर
वक़्त
धीरे-धीरे
बैठ जाता है।
इस कमरे में
कुर्सी है,
मेज़ है,
दीवारों पर
कुछ भी नहीं—
जैसे
यादों ने भी
यहाँ से
हिजरत कर ली हो।
मैं जब
यहाँ आता हूँ,
तो
शहर मुझसे
बाहर रह जाता है,
और मैं
अपने भीतर।
यह कमरा
उदासी का नहीं,
बस
ख़ाली होने का है—
जहाँ
कोई इंतज़ार नहीं,
कोई शिकायत नहीं,
सिर्फ़
थोड़ी-सी
साँस लेने की जगह है।
कभी-कभी
मुझे लगता है,
पूरा शहर
इसी कमरे को
ढूँढ रहा है—
मगर
किसी के पास
इतना वक़्त नहीं
कि
दरवाज़ा
खोल सके।
और मैं
दरवाज़ा बंद करके
यहाँ बैठा रहता हूँ,
क्योंकि
शहर के भीतर
एक ख़ाली कमरा
अब भी
मेरा है।
मुकेश्,,,
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