उजड़े नक़्शे में मेरा पता
उजड़े नक़्शे में
मेरा पता
कहीं दर्ज नहीं है—
फिर भी
मैं हर रोज़
इन्हीं गलियों से
गुज़रता हूँ।
यह शहर
अब वैसा नहीं रहा
जैसा कभी
सोचा गया था,
और मैं भी
वैसा नहीं रहा
जैसा यहाँ
आकर बना था।
दीवारों पर
पुराने इश्तेहार हैं,
वक़्त से उखड़े हुए—
जैसे
किसी ने
उम्मीदें चिपकाई हों
और लौटकर
उन्हें उतारना भूल गया हो।
लोग मिलते हैं,
बातें होती हैं,
मगर
कोई किसी का
पता नहीं पूछता—
शायद
सबको डर है
कि जवाब
ख़ुद से न मिल जाए।
रात को
जब शहर
अपने शोर से
थक जाता है,
मैं
उसी नक़्शे को
दोबारा खोलता हूँ
जिसमें
मेरा नाम नहीं।
और तब समझ आता है—
कुछ पते
मकानों में नहीं,
भटकन में होते हैं।
मैं
उसी भटकन में
अब भी
ख़ुद को ढूँढ रहा हूँ—
उजड़े नक़्शे में
अपना पता।
मुकेश्,,,
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