आईने में एक और चेहरा (गद्य-काव्य आत्मयात्रा)
आज सुबह आईने में चेहरा थोड़ा अलग लगा।
बिलकुल वही आँखें थीं, वही होंठ, वही ललाट
लेकिन कुछ था जो पहले नहीं था।
या शायद पहले भी था,
मगर देखने की फुर्सत कहाँ थी?
आईने में वो चेहरा कुछ कह रहा था,
पर आवाज़ नहीं आ रही थी।
केवल होंठ हिलते थे
जैसे किसी बीते समय का दृश्य मूक चल रहा हो।
मैंने ज़रा गौर से देखा
उस चेहरे में कोई पुरानी थकावट बसी थी,
वो थकावट जो केवल वे लोग लाते हैं
जो अक्सर मुस्कुराते हैं
मगर भीतर टूटते रहते हैं।
आईना चुप था
पर उसकी ख़ामोशी में एक पुकार थी।
कहता था
"तेरा सच तुझसे बाहर नहीं,
तेरे भीतर है — पर तुझसे छिपा हुआ।
तेरे हर झूठ में भी एक सच्चाई दबी है
जो तुझसे मिलना चाहती है।"
मैंने अपने चेहरे को छुआ
नर्म था, मगर ठंडा।
जैसे बरसों से किसी ने उसे छूआ ही न हो
सिर्फ़ माँ की हथेली ने कभी
इसे गर्म किया था।
आईने के पीछे
कोई बैठा था
शायद वही बच्चा
जो अक्सर सपनों में आता था
और पूछता था,
"तू रोता क्यों नहीं अब?"
मैंने जवाब देना चाहा
मगर गला रुंध गया।
शायद सच यही था
मैंने रोना भूल गया था।
या शायद, रोना अब भी भीतर ही भीतर
बर्फ़ की तरह जमा है।
शब्द अब भी रुके हैं,
पर आईना अब दोस्त बन गया है।
हर सुबह कुछ पूछता है,
और मैं हर रात कुछ खोता हूँ।
क्या आपने कभी आईने से बात की है?
उससे जो चुपचाप आपके सारे समय देखता है,
पर कभी कुछ कहता नहीं?
क्या आप भी उस चेहरे से मिले हैं
जो आपको देखता है
पर पहचानता नहीं?
मुकेश ,,,,,,,,
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