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Sunday, 22 March 2026

रात की पलकों पर ठहरी हुई तुम


 रात की पलकों पर ठहरी हुई तुम


रात है

धीरे-धीरे उतरती हुई,

जैसे कोई ख़्वाब

आँखों की देहरी पर आकर ठहर गया हो।


और उस ठहराव में

तुम हो…


चुप,

मुलायम,

जैसे चाँदनी ने

खुद को तुम्हारे चेहरे पर सजा लिया हो।


मैं तुम्हें देखता हूँ

दूर से नहीं,

बहुत पास से भी नहीं…

बस उतना,

जहाँ नज़र और एहसास

एक हो जाते हैं।


तुम्हारी आँखें

रात का सबसे गहरा हिस्सा,

और उनमें चमकते छोटे-छोटे सितारे

जैसे मेरी हर अधूरी ख्वाहिश

तुममें पूरी हो रही हो।


“क्या देख रहे हो?”

तुम धीरे से पूछती हो


मैं मुस्कुरा देता हूँ

“रात को…

जो तुम्हारी पलकों पर ठहर गई है।”


तुम हल्के से शरमा जाती हो

और वो शरमाना

पूरी रात को और भी खूबसूरत बना देता है।


हवा थम-सी जाती है,

झरना भी जैसे

अपनी रफ्तार धीमी कर देता है…


क्योंकि उस पल

सब कुछ तुम्हारे इर्द-गिर्द घूम रहा होता है।


मैं हाथ बढ़ाता हूँ

तुम्हारे चेहरे के पास…

पर छूता नहीं


क्योंकि

कुछ चीज़ें सिर्फ़ महसूस करने के लिए होती हैं।


तुम मेरी तरफ देखती हो

गहराई से…

जैसे कोई सवाल पूछना चाहती हो

पर जवाब पहले ही जानती हो।



“अगर ये रात यहीं रुक जाए तो?”

मैं पूछता हूँ


तुम मुस्कुरा कर कहती हो

“तो हम भी यहीं रह जाएँगे…”


और फिर—

खामोशी दोनों के बीच

एक नई भाषा बन जाती है।


न कोई वादा,

न कोई इकरार

बस एक एहसास,

जो हर शब्द से परे है।



शायद प्रेम यही है

जब कोई

रात की पलकों पर ठहर जाए,

और फिर कभी

उतरने का मन न करे…


और तुम

ठीक वैसी ही हो…


रात की पलकों पर ठहरी हुई…


मुकेश ,

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