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Tuesday, 24 March 2026

इश्क़ - अहम् और इदम का पुनर्मिलन


 इश्क़ - अहम् और इदम का पुनर्मिलन

बहुत पहले

वक़्त की गिरफ़्त से भी पहले,

जब काइनात

एक ख़ामोश सरगोशी थी,


एक ही वजूद था—

वहदत का,

बेमिसाल, बे-इंतिहा…


फिर

न जाने किस ख़्वाहिश की लरज़िश में,

उसने ख़ुद को

दो हिस्सों में तक़सीम कर लिया


एक “अहम्” हुआ,

एक “इदम”…


एक ने कहा— “मैं”,

दूसरे ने कहा— “तू”…


और उसी लम्हे से

फ़ासलों का सिलसिला शुरू हुआ।


अहम्

अपनी पहचान की ज़िद में,

हर बार ख़ुद को साबित करता रहा,


इदम

नर्मी की तरह,

हर बार ख़ुद को बहाता रहा।


दोनों

जुदाई के मौसम में

बार-बार जन्म लेते रहे,

और हर दफ़ा

एक अधूरी-सी तड़प

साथ लाते रहे।


मगर

कभी-कभी,

जब निगाह

निगाह से मिलती है,

और रूह

रूह को पहचान लेती है


तो एक अजीब-सी कशिश

जन्म लेती है…


जैसे कोई पुरानी दास्तान

फिर से याद आ गई हो।


अहम्

इदम में फ़ना होना चाहता है,

इदम

अहम् में समा जाना चाहता है


दोनों

अपनी जुदा-जुदा हस्ती छोड़कर

फिर उसी वहदत की तरफ़

लौटना चाहते हैं…


जहाँ न “मैं” है,

न “तू”…


बस एक ख़ामोश “होना” है।


शायद

इसी तड़प का नाम

इश्क़ है…

मुहब्बत है…

इबादत है…


और हर मिलन

दरअसल

उस बिछड़ी हुई वहदत का

एक लम्हाती एहसास है…।


— मुकेश इलाहाबादी

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