“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
ख़ुशबू का अदृश्य पत्र
कभी-कभी
कोई ख़त
लिखा तो जाता है
पर भेजा नहीं जाता।
वह
साँसों की महक बनकर
हवा में उड़ता रहता है।
जिसे
कोई डाकिया नहीं लाता,
पर दिल
उसे फिर भी पढ़ लेता है।
मुकेश ,,,,,,
No comments:
Post a Comment