“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
साँसों में छिपा हुआ मौसम
तुम्हारी साँसों में
एक मौसम छिपा है
कभी
वह बसंत की तरह महकता है,
शाम की ठंडी हवा बन जाता है।
और कभी
बरसात की पहली मिट्टी की तरह
दिल को
अचानक भर देता है।
शायद
इसीलिए
तुम्हारे पास बैठना
मौसम बदलने जैसा लगता है।
मुकेश ,,,
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