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Wednesday, 25 March 2026

धूप में सूखती भीगी हुई कमीज़

 धूप में सूखती भीगी हुई कमीज़

धूप में टंगी
भीगी हुई कमीज़
धीरे-धीरे
हल्की होने लगती है।

हर बूँद
चुपचाप उड़ जाती है
जैसे कोई दुख
बिना आवाज़ के
छूट रहा हो।

कपड़ा वही है,
पर वज़न बदल गया है—
शायद
भीगना ही
उसे सूखना सिखाता है।

मनोविज्ञान कहता है
जो भीतर भीगता है,
वो एक दिन
धूप ढूँढ़ ही लेता है।

और फिर
हम
उसी कमीज़ को पहनकर
फिर से
ज़िंदगी में निकल पड़ते हैं…।

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