बंद खिड़की के पीछे कैद होती हवा
बंद खिड़की के पीछे
हवा कैद नहीं होती
बस
अपना रास्ता भूल जाती है।
परदे हल्के-हल्के हिलते हैं,
जैसे कोई याद
अंदर आना चाहती हो।
कमरा भरा है,
फिर भी कुछ कमी है
शायद
एक खुलापन…
मनोविज्ञान कहता है
हम खुद को
दीवारों से नहीं,
अपने डर से बंद करते हैं।
खिड़की खोलो
हवा नहीं,
शायद
तुम खुद
अंदर आ जाओ…।
मुकेश ,,,,,,,
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