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Wednesday, 25 March 2026

टूटे हैंडल वाला कप और अधूरी चाय

 टूटे हैंडल वाला कप और अधूरी चाय


टूटे हैंडल वाला कप

अब भी कप ही होता है

बस

उसे पकड़ने का तरीका

बदल जाता है।


अधूरी चाय

ठंडी होकर भी

कुछ कहती रहती है

जैसे बात

बीच में ही छूट गई हो।


कभी किसी ने

जल्दी में रख दिया होगा उसे,

या किसी ख़याल ने

घूँट को रोक लिया होगा।


हैंडल का टूटना

सिर्फ़ एक दरार नहीं

ये उस लम्हे की निशानी है

जब पकड़

थोड़ी ढीली पड़ गई थी।


हम चीज़ों को नहीं,

उनसे जुड़ी

अपनी अधूरी अवस्थाओं को

संभालते हैं।


इसलिए

वो कप फेंका नहीं जाता,

वो रखा रहता है—

किसी कोने में,

जैसे एक चुप गवाह।


और चाय

वो हर बार

पूरी नहीं पी जाती,

कभी-कभी

बस उतनी ही रह जाती है

जितनी याद

हमें ज़िंदा रख सके।


शायद

टूटे हैंडल और अधूरी चाय में ही

ज़िंदगी का सच है


कि सब कुछ

सही-सलामत हो

ये ज़रूरी नहीं,


बस

इतना काफ़ी है

कि हम

उसे फिर भी

थामे रहें…।


मुकेश ,,,,,,,

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