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Wednesday, 25 March 2026

रुक-रुक कर चलती घड़ी का धैर्य

 रुक-रुक कर चलती घड़ी का धैर्य


रुक-रुक कर चलती घड़ी

समय को नहीं रोकती

बस

उसकी चाल पर

थोड़ा-सा प्रश्नचिह्न रख देती है।


हर टिक

जैसे किसी संकोच से निकलता है,

हर टॉक

जैसे किसी सोच में अटका हो।


वो तेज़ नहीं भागती,

पर रुकती भी नहीं पूरी तरह

बीच का यह ठहराव ही

उसका धैर्य है।


कभी लगता है

जैसे वक़्त भी

थक गया हो थोड़ा—

और घड़ी

उसकी सांसों की तरह

धीरे-धीरे चल रही हो।


मनोविज्ञान कहता है

हमारा भीतर

सीधी रेखा में नहीं चलता,

वो ठहर-ठहर कर

खुद को समझता है।


शायद इसलिए

कुछ घड़ियाँ

दौड़ती नहीं,

बल्कि

सोचती हुई चलती हैं।


उनकी सुस्ती में

एक गहराई छुपी होती है

जैसे हर पल

पूरी तरह जीया जा रहा हो।


और तब

समय नहीं,

हम बदलते हैं


धीरे-धीरे,

रुक-रुक कर,

पर

थोड़ा और सच्चे होकर…


मुकेश ,,,,,,,

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