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Wednesday, 25 March 2026

पगडंडी पर छूटे कदमों के निशान

 पगडंडी पर छूटे कदमों के निशान


पगडंडी पर

छूटे हुए कदमों के निशान

कहीं जाते नहीं

बस

धीरे-धीरे मिटने लगते हैं।


मिट्टी याद रखती है

हर गुज़र

चाहे वो हल्का-सा हो

या बोझिल।


कुछ निशान

गहरे होते हैं

जैसे कोई फ़ैसला

पूरी देह से लिया गया हो।


कुछ

बस छूकर निकल जाते हैं

जैसे कोई रिश्ता

पूरा हुए बिना ही लौट गया हो।


धूप आती है,

बारिश गुजरती है,

हवा अपने तरीके से

सब कुछ बराबर करना चाहती है

फिर भी

कुछ छापें रह जाती हैं

अनदेखी।


मनोविज्ञान कहता है

हम हर जगह

थोड़ा-थोड़ा छोड़ते चलते हैं खुद को,

और फिर उम्र भर

उन्हीं बिखरे हिस्सों को

खोजते रहते हैं।


पगडंडी पूछती नहीं,

बस समेटती है

हर कदम, हर ठहराव,

हर लौटना।


और अंत में

जब कोई नहीं होता वहाँ,

तब भी

मिट्टी के भीतर

धीरे से धड़कते रहते हैं

कदमों के निशान…


जैसे

रास्ते कभी खाली नहीं होते,

बस

चलने वाले बदल जाते हैं…।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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