खाली गिलास में बची हुई प्यास
खाली गिलास
सिर्फ़ खाली नहीं होता
उसमें
थोड़ी-सी बची हुई प्यास
ठहरी रहती है।
आख़िरी घूँट के बाद भी
कुछ रह जाता है
होंठों की गर्मी,
और अधूरी तसल्ली का स्वाद।
गिलास
सब कुछ दे देता है,
पर प्यास—
वो पूरी तरह जाती नहीं,
बस थोड़ी देर
चुप हो जाती है।
मनोविज्ञान कहता है
इच्छाएँ बुझती नहीं,
वे रूप बदलती हैं;
एक तृप्ति के बाद
दूसरी चाह
धीरे से जन्म लेती है।
इसलिए
खाली गिलास
कभी सच में खाली नहीं होता
वो इंतज़ार होता है,
अगले भराव का,
अगले स्पर्श का।
हम सोचते हैं
हमने पी लिया सब कुछ
पर भीतर कहीं
एक कोना
अब भी सूखा रह जाता है।
शायद
प्यास ही
हमें ज़िंदा रखती है,
और गिलास
बस एक बहाना है
उसे थोड़ी देर
नाम देने का…।
मुकेश ,,,,,,,,
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