पुराने दरवाज़े की चरमराती हुई यादें
पुराना दरवाज़ा
जब खुलता है
तो सिर्फ़ लकड़ी नहीं बोलती,
उसमें फँसी हुई
कई उम्रों की आवाज़ें
एक साथ चरमराती हैं।
उसकी दरारों में
धूल नहीं,
रुकी हुई मुलाक़ातें रहती हैं
आधे खुले, आधे बंद
किस्से…
कभी
किसी ने उसे धीरे से खोला होगा,
डरते हुए—
जैसे कोई राज़
आवाज़ न कर दे।
कभी
वो झटके से भी खुला होगा
गुस्से में,
या लौट आने की जल्दी में।
अब—
वो वहीं खड़ा है,
थोड़ा झुका हुआ,
थोड़ा थका हुआ,
हर चरमराहट में
एक याद छोड़ता हुआ।
मनोविज्ञान कहता है—
यादें बंद नहीं होतीं,
बस दब जाती हैं
और किसी पुराने दरवाज़े की तरह
मौका मिलते ही
आवाज़ कर उठती हैं।
शायद इसलिए
हम कुछ दरवाज़े
खोलना नहीं चाहते—
डरते हैं,
कि कहीं
अंदर जो है,
वो फिर से
ज़िन्दा न हो जाए।
पर सच तो ये है
दरवाज़े बंद रखने से
आवाज़ें मरती नहीं,
बस गहरी हो जाती हैं…
और एक दिन
वो खुद ही
चरमराकर
हमें पुकार लेती हैं।
मुकेश ,,,,,,,
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