मैं रास्ता था और तुम सफ़र बन गए
मैं रास्ता था
सीधा, सादा,
किसी मंज़िल की ओर बढ़ता हुआ,
जिसे बस चलना आता था,
रुकना नहीं।
और तुम
एक अनजानी सी आहट बनकर आए,
जैसे किसी मोड़ पर
अचानक
ज़िंदगी खड़ी मिल जाए।
मैं रास्ता था
जिस पर लोग गुज़रते थे,
अपने-अपने क़दमों की धूल छोड़कर,
और आगे बढ़ जाते थे
बिना पीछे देखे।
मगर तुम
तुम ठहरे,
तुमने मेरी ख़ामोशी को सुना,
मेरी ख़ालीपन को पढ़ा,
और फिर…
तुम सफ़र बन गए।
अब हर क़दम
सिर्फ़ चलना नहीं रहा,
एक एहसास बन गया
जिसमें तुम्हारी आहट,
तुम्हारी मुस्कान,
तुम्हारी ख़ामोशी भी शामिल थी।
मैं रास्ता था
जिसे अपनी दिशा का इल्म था,
मगर तुमने आकर
हर मोड़ को सवाल बना दिया।
अब हर दिशा
तुम्हारी तरफ़ जाती थी,
और हर मंज़िल
तुम्हारे नाम से शुरू होती थी।
तुम सफ़र बन गए
और मैं
खुद को भूलने लगा,
क्योंकि अब
चलना सिर्फ़ चलना नहीं था,
तुम्हारे साथ होना था।
वक़्त भी बदल गया
पहले वो बस गुजरता था,
अब वो ठहर-ठहर कर
हमारे लम्हों को
महसूस करने लगा।
मैं रास्ता था
जो कभी थकता नहीं था,
मगर अब
हर थकान में
तुम्हारी तलाश होने लगी।
तुम सफ़र बन गए
तो हर दूरी
क़रीब लगने लगी,
हर तन्हाई
आधी रह गई।
मगर सफ़र…
हमेशा साथ नहीं चलता,
कभी-कभी
वो किसी मोड़ पर
खामोशी से उतर जाता है।
और वही हुआ
एक दिन
तुम चुपचाप
किसी और दिशा में मुड़ गए,
बिना कुछ कहे,
बिना कोई निशान छोड़े।
और मैं
फिर वही रास्ता बन गया,
मगर अब
पहले जैसा नहीं था।
अब हर क़दम में
तुम्हारी याद की हलचल थी,
हर मोड़ पर
तुम्हारी कमी का सन्नाटा।
मैं रास्ता था
और तुम सफ़र बन गए,
फिर तुम
कहीं गुम हो गए,
मगर अजीब बात ये है
कि अब भी
जब कोई मुझ पर चलता है,
तो उसे
मेरे भीतर
तुम्हारा एहसास मिलता है।
जैसे तुम
कभी गए ही नहीं,
बस
मेरी रूह में उतर गए हो।
मैं रास्ता था
और तुम सफ़र बन गए…
और अब
मैं सिर्फ़ रास्ता नहीं रहा,
मैं एक कहानी हूँ
जिसे हर मुसाफ़िर
चलते-चलते महसूस करता है,
मगर समझ
बहुत कम लोग पाते हैं।
मुकेश ,,,,,,
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