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Friday, 6 March 2026

चेतना की देह पर लिखा नाम

 चेतना की देह पर लिखा नाम


चेतना

कोई अदृश्य आकाश नहीं,

वह एक जीवित देह है

जिस पर अनुभव

धीरे-धीरे अपने चिन्ह बनाते हैं।


हर स्मृति

एक हल्की रेखा बन जाती है,

हर पीड़ा

थोड़ा गहरा अक्षर।


समय

अपनी उँगलियों से

इन सबको छूता रहता है,

और जीवन

एक लंबा शिलालेख बनता जाता है।


इसी बीच

एक दिन

तुम आईं—


और बिना किसी शोर के

मेरी चेतना की देह पर

एक नाम लिख गईं।


वह नाम

स्याही से नहीं लिखा था,

न शब्दों की कठोर रेखाओं से—


वह लिखा था

धड़कनों की स्याही से,

और स्पर्श की नरम लिपि में।


अब

जब भी मैं

अपने भीतर झाँकता हूँ,

तो पाता हूँ

कि बहुत-सी स्मृतियाँ

धीरे-धीरे धुँधली हो रही हैं।


पर तुम्हारा नाम

अभी भी उतना ही स्पष्ट है—

जैसे किसी पत्थर पर

गहरा उकेरा गया अक्षर।


तब समझ आता है—

कुछ नाम

सिर्फ़ यादों में नहीं रहते,


वे

चेतना की देह पर

एक स्थायी लेख बन जाते हैं।


और समय

चाहे जितना बीत जाए,


वह नाम

भीतर कहीं

धीरे-धीरे

अब भी चमकता रहता है


मुकेश ,,,,,,,,,

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