प्रेम का मौन उपनिषद
प्रेम
कभी-कभी
किसी ग्रंथ की तरह नहीं होता
वह
एक उपनिषद होता है,
जो शब्दों में नहीं,
मौन में खुलता है।
ऋषि
वनों में बैठकर
ब्रह्म के रहस्य सुनते थे,
और शिष्य
चुपचाप
उनकी आँखों में उत्तर खोजते थे।
उसी तरह
तुम्हारे पास बैठकर
मैंने जाना है—
कि प्रेम का सबसे गहरा ज्ञान
कहा नहीं जाता।
वह बस
धीरे-धीरे
अनुभव में उतरता है।
जब तुम
कुछ कहे बिना
मेरे पास बैठती हो,
तो लगता है
जैसे किसी प्राचीन उपनिषद का
एक नया अध्याय खुल गया हो।
तुम्हारी आँखें
मंत्रों की तरह शांत हैं,
तुम्हारी मुस्कान
किसी सूक्त की तरह संक्षिप्त।
और उस मौन में
कई प्रश्न
अपने आप शांत हो जाते हैं
जैसे नदी
समुद्र में पहुँचकर
अपना शोर भूल जाती है।
तब समझ आता है—
प्रेम
किसी वाद-विवाद का विषय नहीं,
एक आंतरिक दीक्षा है।
जहाँ
दो आत्माएँ
एक ही मौन में बैठकर
अचानक समझ जाती हैं
कि सत्य क्या है।
शायद इसलिए
प्रेम का उपनिषद
कभी लिखा नहीं गया
वह
हर उस हृदय में
मौन की तरह जन्म लेता है
जो किसी के सामने
पूरी तरह खुल जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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