कमरे, दर्द और एक बेआवाज़ महक
कमरा बंद था,
पर भीतर जाने कितनी आवाज़ें थीं
दीवारों पर टिके हुए दिन,
छत से उलझी हुई रातें।
खिड़की के पास रखी कुर्सी
अब भी तुम्हारा इंतज़ार करती है,
उस पर धूप आती है रोज़,
पर बैठने की आहट
कहीं खो गई है।
दर्द यहाँ दिखाई नहीं देता,
बस हवा में घुला रहता है—
जैसे किसी पुराने ख़त की स्याही,
जो पढ़ी न जाए
फिर भी महकती रहे।
मैंने कई बार चाहा
कि इस कमरे को खाली कर दूँ,
यादों की अलमारी बंद कर दूँ,
पर हर बार
एक बेआवाज़ महक
मेरे हाथ थाम लेती है।
वो कहती नहीं कुछ भी,
पर समझाती है
प्रेम कभी पूरी तरह जाता नहीं,
वह बस रूप बदल लेता है,
और कमरे की ख़ामोशी में
धीरे-धीरे
साँस लेता रहता है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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