सन्नाटे में सफ़ेद फूल
सन्नाटा उतरा था आहिस्ता-आहिस्ता,
दीवारों पर टिककर बैठ गया था समय,
हवा भी जैसे पाँव दबाकर चलती थी
कहीं ख़्वाबों की नींद न टूट जाए।
उसी ठहरे हुए पल में
एक सफ़ेद फूल चुपचाप खिला,
न उसने रंग माँगा,
न किसी नज़र की तस्दीक़।
उसकी पंखुड़ियों पर
रात की ओस ठहरी थी,
जैसे किसी अनकहे प्रेम की
आख़िरी पारदर्शी दलील।
मैं देर तक उसे देखता रहा
वह कुछ नहीं बोलता था,
फिर भी उसके आसपास
एक गहरा संवाद बहता था।
सन्नाटे के बीच
वह सफ़ेद फूल
किसी पवित्र स्वीकार-सा लगा
कि शोर के बिना भी
प्रेम खिल सकता है,
और बिना कहे भी
कोई पूरी तरह सुना जा सकता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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