महकती रात में थका हुआ दिल
महकती रात थी —
रातरानी की खुशबू से भीगी हुई,
चाँद खिड़की पर ठहरा था
जैसे कोई पुराना ख़त पढ़ रहा हो।
और इस सारी रौशनी के बीच
मेरा दिल
थका हुआ बैठा था चुपचाप।
दिन भर की मुस्कानों का बोझ,
अनकहे शब्दों की धूल,
कुछ अधूरे सपनों की किरचें
धड़कनों में अटकी थीं।
हवा आई तो लगा
कोई नाम लेकर पुकार गया,
मैंने आँखें मूँद लीं
कहीं उम्मीद फिर से न जाग उठे।
महकती रात पूछती रही
किस बात का ग़म है तुम्हें?
मैं क्या कहता —
इश्क़ का सफ़र लंबा था,
बस साथ थोड़ा कम था।
चाँद अब भी ठहरा है,
रात अब भी महक रही है,
पर मेरा थका हुआ दिल
किसी सच्चे स्पर्श की
नींद तलाश रहा है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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