होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Wednesday, 4 March 2026

तुम और तुम्हारे कान के हिलते हुए झुमके

 तुम और तुम्हारे कान के हिलते हुए झुमके


तुम्हारे कानों से झूलते वे नन्हे झुमके

सिर्फ़ गहने नहीं

मेरे धैर्य की परीक्षा हैं,

जो हर आहट पर धीरे-धीरे बज उठते हैं।


जब तुम गर्दन ज़रा-सी मोड़ती हो,

वे हौले से एक-दूसरे से टकराते हैं

जैसे दो राग

अनजाने में एक ही सुर पकड़ लें।


मैंने देखा है,

तुम्हारी हँसी से पहले

वही झुमके मुस्कुराते हैं

हल्की-सी थरथराहट में

राज़ खोलते हुए।


कभी तुम बात बनाते हुए

आँखें चुरा लेती हो,

पर वे झुमके

तुम्हारी हर शरारत का बयान दे देते हैं

छन-छन की भाषा में।


हवा जब तुम्हारे पास से गुज़रती है,

तो सबसे पहले

उन्हीं को छूती है

और वे मानो

हवा को भी अपने संग नचा लेते हैं।


तुम और तुम्हारे हिलते हुए झुमके

दोनों मिलकर

मेरे भीतर एक उत्सव रच देते हो,

जहाँ शब्द कम पड़ जाते हैं,

और दिल

सिर्फ़ उस मीठी छनकार में

खुद को सौंप देता है।


मुकेश ,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment