ख़ामोशी का दरिया
हमारे दरमियान
अब लफ़्ज़ नहीं बहते
बस एक ख़ामोशी है,
जो दरिया बन गई है।
मैं उस दरिया में
डूबता हूँ हर रात
और हर बार
कुछ नया पा लेता हूँ।
तुम्हारी आवाज़ नहीं,
फिर भी एक सदा है
जो दिल के भीतर
गूंजती रहती है।
शायद इश्क़ वही है
जहाँ बोलना छोड़कर
सुनना शुरू हो जाता है।
मुकेश ,,,,,
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