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Tuesday, 24 March 2026

फ़ना के उस पार तुम्हारा निशाँ

 फ़ना के उस पार तुम्हारा निशाँ


जब मैं

अपने ही वजूद से उतरने लगा,

और “मैं” की आख़िरी साँस

ख़ामोशी में घुलने लगी


वहीं कहीं,

फ़ना की उस गहरी तह में

तुम्हारा एक हल्का-सा निशाँ

रौशनी बनकर उभरा।


न तुम थे,

न मैं रहा

बस एक एहसास था,

जो इबादत से भी पाक था।


मैं मिटता गया

और तुम निखरते गए,

जैसे कोई दुआ

अपने लफ़्ज़ भूलकर

सिर्फ़ असर बन जाए।


अब न तलाश है,

न कोई फ़ासला

क्योंकि फ़ना के उस पार

जो बचा है…

वो तुम हो,

या शायद

तुम्हारे बहाने

मैं ही हूँ।


मुकेश ,,

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