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Tuesday, 24 March 2026

नींद और तुम्हारे बीच अटका हुआ मैं

 नींद और तुम्हारे बीच अटका हुआ मैं


नींद और तुम्हारे बीच

एक महीन-सी दरार है

जिसमें मैं गिरा हुआ हूँ,

जैसे कोई ख़्वाब

अपनी ताबीर से पहले

ठहर गया हो।


तुम्हारी याद

धीरे-धीरे मेरी रूह में उतरती है,

जैसे फ़िज़ा में घुलती हो

किसी अज़ान की आख़िरी लरज़िश

न दिखाई देती है,

न छुई जाती है,

बस सुनाई देती है

भीतर… बहुत भीतर।


मैं आँखें बंद करता हूँ

तो नींद नहीं आती,

तुम चली आती हो—

बिना आहट, बिना इजाज़त,

और मेरी हर साँस पर

अपना नाम लिख जाती हो।


ये कैसी मुहब्बत है तुम्हारी,

कि सुकून भी तुम हो,

बेचैनी भी तुम

मैं सोना भी चाहूँ

तो तुम्हारे ख़याल

तकिए से सरककर

मेरे दिल के नीचे आ जाते हैं।


नींद नाराज़ बैठी है

किसी कोने में,

और मैं

तुम्हारी रौशनी में जागता हुआ

धीरे-धीरे

तुम्हीं में खोता जाता हूँ…


शायद मुहब्बत यही है

जहाँ नींद हार जाए,

और रूह

किसी एक नाम की

मुरीद हो जाए।


मुकेश ,,,,,,,

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