भीड़ में गुम होती हुई आत्मा
भीड़ बहुत है यहाँ
चेहरों की
आवाज़ों की
ख़्वाहिशों की
हर तरफ़
चलते हुए जिस्म हैं
भागते हुए साए हैं
मगर
किसी की रूह
कहीं दिखाई नहीं देती
हर कोई
किसी न किसी के साथ है
और अजीब बात है
हर कोई
अकेला है
बाज़ारों में
रोशनी बहुत है
इतनी कि
आँखें चौंधिया जाएँ
मगर
दिल के अंदर
एक कोना है
जो अब भी
अँधेरे में बैठा है
लोग
नाम पुकारते हैं
चेहरे पहचानते हैं
मगर
कोई किसी की
ख़ामोशी नहीं पढ़ता
मैंने देखा है
हँसते हुए चेहरों के पीछे
एक थका हुआ आदमी
जो
बस थोड़ी देर
किसी सच्चे कंधे की तलाश में है
ये कैसी भीड़ है
जहाँ
टकराहटें बहुत हैं
मुलाक़ातें नहीं
हर कोई
अपनी कहानी सुनाना चाहता है
मगर
सुनने वाला
कोई नहीं
एक बच्चे ने
भीड़ में खोकर
रोना शुरू किया
लोग आए
उसकी तस्वीर ली
और आगे बढ़ गए
किसी ने
उसका हाथ नहीं पकड़ा
मेरे भीतर
कोई पुराना दरवेश
धीरे से कहता है
“तू भीड़ में नहीं खोया
तू खुद से बिछड़ गया है”
मैं रुकता हूँ
थोड़ा पीछे हटता हूँ
आँखें बंद करता हूँ
और
पहली बार
भीड़ का शोर
कम होने लगता है
अंदर कहीं
एक हल्की-सी आवाज़ आती है
“मैं यहाँ हूँ…”
शायद
आत्मा
कभी गुम नहीं होती
हम ही
उसे
भीड़ के हवाले कर देते हैं
अब
मैं कम भागता हूँ
कम बोलता हूँ
कम ढूँढता हूँ
और अजीब बात है
भीड़ अब भी उतनी ही है
मगर
उसके बीच
मैं थोड़ा-सा
खुद को सुन लेता हूँ
कविता :
“इसे कविता मत कहिए
ये शायद
भीड़ से लौटती हुई एक रूह की सरगोशी है…”
मुकेश ,,,,,,,,,
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