आध्यात्मिक बाज़ार
आज
रूह का भी
एक बाज़ार लगा है
चौराहों पर
इबादत बिक रही है
गलियों में
मुक्ति के पोस्टर लगे हैं
कोई कहता है
“आओ, तुम्हें खुदा से मिला दूँ”
और
उसके पीछे
एक रेट-लिस्ट टंगी होती है
ज़िक्र की महफ़िलें सजती हैं
नूर की बातें होती हैं
मगर
आँखों में
तिजारत चमकती है
मस्जिद से
मंदिर तक
आश्रम से
स्टूडियो तक
हर जगह
रास्ते बताए जा रहे हैं
मगर
मंज़िल कहीं गुम है
एक दरवेश
कोने में बैठा हँस रहा है
कहता है
“जिसे तुम बेच रहे हो
वो बिकता ही नहीं”
लोग
माला गिनते हैं
साँसें गिनते हैं
मिनट गिनते हैं
और समझते हैं
इबादत पूरी हो गई
किसी ने
खामोशी को भी
कोर्स बना दिया
किसी ने
ध्यान को
वीडियो बना दिया
और रूह
वो अब भी
किसी सूने जंगल में
तन्हा बैठी है
किसी सच्चे पुकारने वाले का
इंतज़ार करती हुई
मैंने देखा है
जो सबसे ज़्यादा बोलते हैं
खुदा के बारे में
वो अक्सर
खुद से सबसे दूर होते हैं
और
जो चुप रहते हैं
उनके अंदर
कोई नूर उतरता है
ये कैसा बाज़ार है
जहाँ
खरीदने वाला भी भटका हुआ है
बेचने वाला भी
मेरे भीतर
कोई फकीर
धीरे-धीरे जागता है
और कहता है
“छोड़ दे ये सब दुकाने
चल
खुद को ढूँढ”
अब
मैं कम जानना चाहता हूँ
कम पाना चाहता हूँ
बस
एक सच्ची खामोशी
एक सच्ची पुकार
और
एक सच्चा राब्ता
क्योंकि
जो असली है
वो
न किताब में मिलता है
न बाज़ार में
वो
सिर्फ़
दिल के सूने कमरे में
खामोशी की तहों में
छुपा बैठा है
कविता :
“इसे कविता मत कहिए
ये शायद
एक खोई हुई तलाश की आह है…”
मुकेश ,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment