डहलिया के रंग—लाल, पीले, बैंगनी, सफ़ेद और तुम
बगीचे में आज
डहलिया अपने रंग बिखेर रहे थे
लाल की आग,
पीले की हल्की धूप,
बैंगनी की गहरी छाया,
सफ़ेद की कोमल शांति।
मैं देखता रहा
और फिर अचानक
तुम याद आ गई।
क्योंकि तुम
सिर्फ़ रंग नहीं हो
तुम वह अनुभव हो
जो सभी रंगों को जोड़ देता है।
लाल की तरह
जो जज़्बात को भड़का दे,
पीले की तरह
जो सुबह की गर्माहट दे,
बैंगनी की तरह
जो रहस्य की खामोशी में ले जाए,
सफ़ेद की तरह
जो सब कुछ शांति में बदल दे
और तुम
उन सब रंगों का मेल हो,
जो फूलों में नहीं,
बल्कि दिल में खिलता है।
डहलिया के बीच खड़े होकर
मैं समझता हूँ
कुछ चीज़ें केवल देखी नहीं जातीं,
उनका एहसास किया जाता है।
और आज
डहलिया के रंगों में
साफ़-साफ़ दिख रहा है
तुम
मुकेश ,,,,,,,,,,
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