डहलिया के बहाने तुम
आज बगीचे में
डहलिया धीरे-धीरे खुल रहे थे
हर पंखुड़ी में
रंगों की नर्म फिसलन,
सूरज की हल्की छुअन।
मैं उनका नाम लेने लगा,
पर हर बार
दिल कुछ और ही कहता
डहलिया के बहाने
तुम याद आ गए।
क्योंकि तुम्हारी मुस्कान भी
कुछ वैसी ही है
धीरे-धीरे खुलती हुई,
पहले आँखों में
फिर होठों पर
और अंत में
सारा मौसम अपने अंदर समेट लेती।
फूलों की हर परत
जैसे तुम्हारी किसी अदा की झलक हो
एक खामोशी,
एक हल्की सी शरारत,
एक अधूरा सा सवाल
जो शब्दों में कभी नहीं आया।
हवा चली
तो डहलिया हिले,
और मैं समझ गया
कुछ यादें भी
हवा की तरह होती हैं,
फूलों के बहाने
आकर छू जाती हैं।
आज बगीचे में
हर रंग की डहलिया
तुम्हारे नाम का पैग़ाम लायी
और मैं मुस्कुराया,
क्योंकि डहलिया के बहाने
तुम फिर मेरे सामने थी
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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