तुम और बगीचे का सबसे गहरा रंग
बगीचे में
आज डहलिया का मौसम है
रंग इतने गहरे
कि लगता है
मिट्टी ने अपनी सारी ख़ामोशियाँ
फूलों में उगा दी हों।
मैं एक डहलिया के सामने ठहर गया,
उसकी पंखुड़ियाँ
परत-दर-परत खुलती हुई—
जैसे कोई रहस्य
धीरे-धीरे अपना चेहरा दिखा रहा हो।
और उसी पल
तुम याद आईं।
क्योंकि
तुम भी तो
बगीचे का सबसे गहरा रंग हो
वह रंग
जो दूर से दिखाई नहीं देता,
पर पास आओ
तो आँखों में उतर जाता है।
डहलिया का लाल
सिर्फ़ लाल नहीं होता,
उसमें धूप की तपिश भी होती है
और शाम की नरमी भी।
तुम्हारी मुस्कान भी
कुछ ऐसी ही है—
उसमें शरारत की हल्की लौ है
और सुकून की एक धीमी छाया।
हवा चली
तो फूल थोड़ा झूम गया,
जैसे किसी ने
तुम्हारा नाम
फूलों की भाषा में पुकारा हो।
मैंने सोचा
अगर कभी
बगीचे से सारे रंग उठ जाएँ,
तो शायद
सिर्फ़ तुम्हें याद कर लेना
काफ़ी होगा।
क्योंकि
तुम अकेली ही
उस गहराई का रंग हो
जिससे
पूरा बगीचा बनता है
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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