अमावस की रात और तुम
सुमी,
जानती हो
ये जो अमावस की शब होती है न,
ये यूँ ही बे-नूर नहीं हुई।
कहते हैं,
कभी हर रात के दामन में
थोड़ी-सी चाँदनी महफ़ूज़ रहती थी
मगर एक शब
एक आसमानी रूह उतरी थी ज़मीं पर,
ठीक तुम्हारी तरह… नर्म, दिलनशीं।
उसकी कजरारी निगाहों पर
माह-ए-तमाम भी फ़िदा हो गया,
और अपनी सारी रौशनी
उसके हवाले कर दी।
तब से हर माह
एक शब ऐसी आती है
जब चाँद ग़ायब रहता है,
और फ़ज़ा में
बस ख़ामोशी की सियाही ठहरी रहती है।
लोग उसे अमावस कहते हैं,
मैं उसे
तुम्हारा इंतज़ार कहता हूँ।
क्योंकि सुमी,
जब तुम नहीं होती
मेरी हर रात
यूँ ही बे-नूर हो जाती है…
सुन रही हो न, मेरी सुमी?
मुकेश ,,,,,,,,

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