सीमाओं के पार
तुम्हें सोचते ही
मन अपने ही नक़्शे मिटाने लगता है
जैसे हर रास्ता
तुम तक पहुँचने से पहले
ख़ुद को भूल जाना चाहता हो।
तुम कोई ख़्वाब नहीं,
एक आदत भी नहीं
तुम वो लम्हा हो
जो हर बार
मुझे मेरे ही अंदर से
निकाल कर
तुम्हारे पास रख देता है।
हमारे बीच
जो नहीं कहा गया,
वही सबसे ज़्यादा घटता है
वहीं सबसे गहरी हलचल है,
वहीं
सबसे सच्चा मिलन।
तुम्हारे पास होना
जैसे अपने ही भीतर
किसी अनजाने कमरे में
पहली बार दाख़िल होना
जहाँ हर चीज़
पहले से तुम्हारी है।
और मैं…
हर बार
उसी कमरे में
ख़ुद को
थोड़ा और
तुम्हारा पाता हूँ।
मुकेश्,,,,
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