शुक्र का भाव — एक अधूरी युति”
मैं
लग्न में बैठा शनि,
धीरे-धीरे सीखता हुआ
कर्मों की कठोर व्याख्या।
तुम
चन्द्र,
मेरे चतुर्थ भाव की नमी,
जहाँ हर एहसास
घर ढूँढता है।
और हमारे दरमियान
शुक्र,
सप्तम भाव का स्वामी,
जो संबंधों को सिर्फ़ जोड़ता नहीं,
उनकी परीक्षा भी लेता है।
जब पहली बार
तुम मेरी दृष्टि में आईं
वो केवल देखना नहीं था,
वो सप्तम भाव की सक्रियता थी,
जहाँ “मैं”
पहली बार “तुम” से मिला।
शुक्र उस वक़्त
उच्च का था शायद
क्योंकि हर बात में मधुरता थी,
हर खामोशी में भी
एक संगीत छुपा था।
हमारी कुंडलियाँ
किसी अदृश्य युति में बंधी थीं
जैसे नवांश में
कुछ पहले ही तय हो चुका हो।
मगर
हर योग स्थायी नहीं होता
जब दशा बदली,
तो वही शुक्र
षष्ठ भाव की छाया में चला गया
जहाँ प्रेम
ऋण, रोग और संघर्ष में बदलता है।
तुम्हारी मुस्कान
अब भी वही थी,
मगर उसके पीछे
प्रश्नों की दृष्टि आ गई थी
शायद राहु ने
अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था।
मैं समझ नहीं पाया
ये प्रेम था,
या किसी पिछले जन्म का ऋण
जो इस जीवन में
चुकाया जा रहा था।
हम दोनों
दृष्टियों में बंधे रहे
कभी शुभ,
कभी पाप,
कभी साथ,
कभी एक-दूसरे के विपरीत।
शुक्र अब भी था
मगर उसका भाव बदल गया था,
और भाव बदलते ही
अर्थ भी बदल जाते हैं।
तुम
द्वादश भाव की तरह दूर हो गईं
जहाँ संबंध
स्मृति बन जाते हैं,
और मिलन
एक स्वप्न।
मैं
अष्टम भाव में उतर गया,
अपने ही भीतर,
जहाँ हर चीज़
रहस्य बन जाती है।
अब समझ आता है
हमारा मिलना
कोई संयोग नहीं था,
एक योग था
जिसे बनना भी था,
और टूटना भी।
क्योंकि
हर शुक्र
सिर्फ़ विवाह नहीं देता,
कभी-कभी
वो आत्मा को
प्रेम की असली परिभाषा भी सिखाता है।
अब
जब मैं अपनी दशा देखता हूँ
तो पाता हूँ
कि वो समय
बस एक अंतरदशा था,
जो बीतना ही था।
मगर उसका प्रभाव
अब भी मेरी कुंडली में नहीं,
मेरी रूह में लिखा है।
तुम शायद
किसी और के सप्तम भाव में
अपना सौंदर्य बिखेर रही हो
और मैं…
अब भी अपने लग्न में बैठा
ये समझ रहा हूँ
कि
प्रेम का सबसे गहरा योग
मिलन में नहीं,
समझ में होता है।
मुकेश ,,,,
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