मैं, तुम और सुबह का तारा
मैं,
एक ठहरी हुई रात का आख़िरी ख़्वाब,
जिसकी पलकों पर
अब भी नींद की नमी बाक़ी है।
तुम—
एक नरम सी रोशनी,
जो अँधेरे से लड़ती नहीं,
बस उसे ख़ुद में घोल देती है।
और वो—
सुबह का तारा,
शुक्र…
जो आसमान के माथे पर
मोहब्बत की आख़िरी निशानी बनकर चमकता है।
हम तीनों
कभी एक ही लम्हे में मिले थे—
जब रात
धीरे-धीरे उतर रही थी,
और सुबह
चुपचाप जन्म ले रही थी।
मैंने तुम्हें देखा—
जैसे कोई इबादत
अचानक क़ुबूल हो जाए,
बिना माँगे,
बिना आवाज़ के।
तुमने मुस्कुराकर
आसमान की तरफ़ इशारा किया—
“देखो…
वो तारा अब भी वहीं है।”
मैंने पूछा—
“क्या ये हर सुबह आता है?”
तुमने कहा—
“हाँ…
मगर हर किसी को नज़र नहीं आता।”
उस दिन समझ आया—
मोहब्बत भी
उसी तारे की तरह होती है,
हर दिल के आसमान पर उगती है,
मगर हर कोई
उसे पहचान नहीं पाता।
मैं रात था—
तुम सुबह,
और वो तारा
हम दोनों के दरमियान
एक ख़ामोश पुल।
जब तुम चली गईं,
तो सुबह भी साथ ले गईं,
बस वो तारा रह गया—
मेरे और तुम्हारे दरमियान
एक अधूरी रौशनी बनकर।
अब जब भी
फ़ज्र की हवा चलती है,
मैं आसमान को देखता हूँ—
शायद तुम फिर
किसी किरण के साथ लौट आओ।
और वो तारा—
अब भी वहीं होता है,
मगर अब
वो सिर्फ़ रौशनी नहीं,
एक याद है।
एक ऐसी याद
जो हर सुबह कहती है—
“मोहब्बत कभी जाती नहीं,
बस अपनी शक्ल बदल लेती है।”
मैं—
अब भी रात का हिस्सा हूँ,
तुम—
शायद किसी और सुबह में हो,
मगर वो तारा…
हम दोनों का है,
जो हर रोज़ उगकर भी
कभी पूरी तरह ढलता नहीं।
मुकेश ,,,,
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