एक सितारे की तन्हाई
वो एक सितारा थी
न सबसे रौशन,
न कोई जिसे नाम मिला हो,
बस एक ख़ामोश चमक
जो बे-किनारा आसमान में खोई हुई थी।
वो आग से पैदा हुई थी
एक शोर भरे विस्फोट में,
मगर उसकी ज़िन्दगी
दूर से हमेशा
सुकून जैसी दिखती रही।
बरसों तक
वो ख़ामोशी में जलती रही
अपनी रौशनी देती हुई
उन दुनिया वालों को
जिन्हें वो कभी छू नहीं सकती थी,
रास्ते दिखाती हुई
जिन पर वो खुद कभी चल नहीं सकती थी।
कुछ सैय्यारे
दूसरों के इर्द-गिर्द घूमते रहे,
कहीं आकाशगंगाएँ
अपनों में सिमटी रहीं
मगर वो…
वो ठहरी रही,
एक ऐसी जगह पर
जिसे उसने कभी चुना ही नहीं।
कभी-कभी
वो गुज़रते हुए शहाबों को देखती
आज़ाद, बेक़रार, लम्हाती
और सोचती
कि चलना कैसा होता होगा।
तारीकी अक्सर उससे कहती
“तू काफ़ी है,
तू इस ख़ला को रौशन करती है।”
मगर वो जानती थी—
ख़ला को रौशन करना
उसे भर देना नहीं होता।
एक दिन
उसे एक खिंचाव महसूस हुआ
एक ख़ामोश सी कशिश
किसी दूर के सितारे से,
जो उस सन्नाटे के पार था।
पहली बार
वो अपनी तन्हाई में
अकेली नहीं थी।
उस फ़ासले के दरमियान
उनकी बातें होने लगीं
लफ़्ज़ों में नहीं,
बल्कि रौशनी की हल्की सी थरथराहट में,
जिसे सिर्फ़ वो दोनों महसूस कर सकते थे।
एक रिश्ता बना
नाज़ुक, दूर,
मगर हर क़ुर्बत से गहरा।
वो और तेज़ जलने लगी
दिखने के लिए नहीं,
बल्कि महसूस होने के लिए
उस एक वजूद के पास
जो बे-इंतिहा फ़ासलों में था।
मगर कायनात
ऐसी दास्तानों पर
मेहरबान नहीं होती।
वक़्त फैलता गया
फ़ासले बढ़ते गए
और जो कभी क़रीब लगता था
धीरे-धीरे
याद बनता गया।
उसकी रौशनी अब भी सफ़र करती है,
वहीं पहुँचती है
जहाँ कभी उसका दिल था,
मगर जब तक वो पहुँचती है
वो खुद
वो नहीं रहती जो कभी थी।
अब भी
वो वैसे ही चमकती है
ठहरी हुई, दूर, ख़ामोश
मगर उसकी रौशनी में कहीं
एक दास्तान छुपी है
जिसे कोई दूरबीन नहीं पढ़ सकती।
और अगर तुम ग़ौर से देखो
तो शायद महसूस कर सको
उसकी चमक में
वो हल्की सी थरथराहट,
जैसे वो अब भी कह रही हो
“कभी-कभी,
बेनिहायत फ़ासलों के बावजूद,
हम मिलते तो हैं…
मगर सिर्फ़ ये समझने के लिए
कि जुदाई कितनी वसीअ होती है।”
मुकेश ,,,,
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