समय की थकी हुई दोपहर
दोपहर
आज कुछ ज़्यादा ही थकी हुई है
जैसे समय
थोड़ी देर के लिए
छाँव ढूँढ रहा हो।
धूप
धीरे-धीरे फर्श पर
फैलती जाती है,
और हम
बिना कुछ कहे
उसे देखते रहते हैं।
तुम पास बैठी हो,
और तुम्हारी ख़ामोशी में
एक ठंडी-सी हवा है
जो इस थकान को
हल्का कर देती है।
घड़ी चलती रहती है,
पर उसकी आवाज़
अब उतनी तेज़ नहीं—
जैसे वो भी
थोड़ा आराम चाहती हो।
मुझे लगता है
अगर समय कहीं रुकता होगा,
तो शायद
यही
ऐसी ही किसी
थकी हुई दोपहर में।
मुकेश ,,,
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