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Friday, 6 March 2026

प्रेम : पाप-पुण्य से परे का अनुभव

 प्रेम : पाप-पुण्य से परे का अनुभव


बहुत समय तक

मैंने जीवन को

पाप और पुण्य की तराजू पर तौला—

कौन-सा कर्म उजला है,

कौन-सा अँधेरा।


धर्म के ग्रंथों ने कहा—

यह करो तो पुण्य,

यह करो तो पाप।


और मनुष्य

अपने ही हृदय के भीतर

एक न्यायालय लेकर चलता रहा।


पर जब प्रेम

धीरे-धीरे मेरे भीतर आया,

तो लगा

यह किसी तराजू में नहीं उतरता।


प्रेम

न तो पाप की छाया है,

न पुण्य का पदक।


वह तो

किसी गहरे अनुभव की तरह है—

जहाँ मनुष्य

पहली बार

अपने ही सीमित नियमों से बाहर निकलता है।


तुम्हारे सामने खड़ा होकर

मैंने देखा—

कि वहाँ कोई गणना नहीं है,

कोई निर्णय नहीं।


सिर्फ़

एक स्वीकृति है,

जैसे जीवन

जीवन को पहचान रहा हो।


तब समझ आया—

पाप और पुण्य

समाज की भाषाएँ हैं,

पर प्रेम

अस्तित्व की भाषा है।


जहाँ

मनुष्य

अपने छोटे-छोटे निर्णयों से ऊपर उठकर

एक बड़े अनुभव में प्रवेश करता है।


और उस क्षण

जब हृदय सचमुच खुल जाता है,


तो लगता है

जैसे आत्मा कह रही हो—


प्रेम

किसी कर्म का परिणाम नहीं,

यह तो

अस्तित्व का

सबसे शुद्ध अनुभव है,


जो

पाप और पुण्य दोनों से

थोड़ा ऊपर

चुपचाप

धड़कता रहता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,

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