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Monday, 16 March 2026

लघु उपन्यास - साक्षी और अस्तित्व - अंतिम पृष्ठ

लघु उपन्यास - साक्षी और अस्तित्व - अंतिम पृष्ठ

कई वर्ष बाद।

नदी वैसे ही बह रही थी।

समय बदल गया था।

घाट की सीढ़ियाँ कुछ और घिस चुकी थीं।

पीपल का वृक्ष थोड़ा और विशाल हो गया था।

दोपहर की धूप में एक युवक घाट की सीढ़ियाँ उतर रहा था।

उसके हाथ में एक पुरानी डायरी थी।

वह धीरे-धीरे नीचे आया

और नदी के किनारे बैठ गया।

कुछ देर तक वह पानी को देखता रहा।

फिर उसने डायरी खोली।

पहले पन्ने पर वही चिन्ह बना था

वृक्ष

और उसके नीचे बहती हुई नदी।

युवक ने धीरे से बुदबुदाया

“यह चिन्ह आखिर है क्या?”

पीछे से एक शांत आवाज़ आई

“कभी-कभी प्रश्न ही उत्तर होता है।”

युवक ने मुड़कर देखा।

एक वृद्ध व्यक्ति सीढ़ियों पर खड़ा था।

सादा कपड़ा।

शांत आँखें।

युवक ने पूछा

“आप यहाँ रहते हैं?”

वृद्ध मुस्कराया।

“नहीं।

मैं तो बस कभी-कभी आता हूँ।”

“क्यों?”

वृद्ध ने नदी की ओर देखते हुए कहा—

“यह देखने कि कोई नया प्रश्न जन्म तो नहीं ले रहा।”

युवक ने फिर डायरी की ओर देखा।

“मुझे लगता है कि यह किसी अधूरी कहानी का हिस्सा है।”

वृद्ध ने धीरे से कहा

“हर कहानी अधूरी ही होती है।”

नदी की हवा हल्की-सी चली।

पीपल के पत्ते हिलने लगे।

युवक ने पूछा

“क्या आपको पता है कि यह कहानी किसकी है?”

वृद्ध ने कुछ क्षण उसे देखा।

फिर मुस्कराया।

“शायद तुम्हारी।”

युवक कुछ समझ नहीं पाया।

लेकिन अचानक उसे लगा

जैसे यह जगह

यह नदी

और यह चिन्ह

कहीं न कहीं उससे पहले भी जुड़े हुए हैं।

वृद्ध धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

कुछ दूर जाकर वह रुक गया।

और पीछे मुड़कर बोला—

“अगर कभी तुम्हें लगे कि तुम उत्तर के बहुत पास पहुँच गए हो…

तो सावधान रहना।”

युवक ने पूछा

“क्यों?”

वृद्ध ने कहा

“क्योंकि उसी क्षण

एक नई यात्रा शुरू होती है।”

वह चला गया।

नदी बहती रही।

पीपल का वृक्ष हवा में हिलता रहा।

और घाट की सीढ़ियों पर बैठा युवक पहली बार यह सोच रहा था

कि शायद

हर मनुष्य के भीतर

एक ऐसी कहानी होती है

जिसका पहला अध्याय हम नहीं लिखते,

और

जिसका अंतिम अध्याय

कभी लिखा ही नहीं जाता। 

मुकेश ,,,

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