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Monday, 16 March 2026

लघु उपन्यास : अस्तित्व और साक्षी-भाग – 3 : अंतिम अध्याय-अध्याय 19 : जो रह गया था

 लघु उपन्यास : अस्तित्व और साक्षी-भाग – 3 : अंतिम अध्याय-अध्याय 19 : जो रह गया था

सुबह धीरे-धीरे उतर रही थी।

नदी का पानी अब सुनहरी रोशनी में चमक रहा था।

रात की सारी बातें मानो हवा में घुल गई थीं।

घाट पर केवल तीन लोग खड़े थे।

अस्तित्व।

साक्षी।

और नील।

प्रवासी कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।

नील ने चारों ओर देखा।

“वह कहाँ गया?”

अस्तित्व ने शांत स्वर में कहा

“कुछ लोग आते ही इसलिए हैं कि हमें एक रास्ता दिखा सकें…

फिर वे चले जाते हैं।”

साक्षी चुप थी।

उसकी आँखें अब भी पीपल के वृक्ष की ओर लगी हुई थीं।

“क्या तुम्हें सच में लगता है कि यह सब नाना की योजना थी?”

उसने धीरे से पूछा।

अस्तित्व ने कुछ क्षण सोचा।

फिर उसने कहा

“मुझे लगता है कि यह योजना नहीं थी…

यह विश्वास था।”

“किस बात का?”

“इस बात का कि मनुष्य एक-दूसरे की खोज पूरी करते हैं।”

नील हल्का-सा मुस्कराया।

“तुम हमेशा बातों को बहुत गहरा बना देते हो।”

अस्तित्व ने भी मुस्कराकर कहा

“शायद इसलिए कि जीवन कभी सतही नहीं होता।”

कुछ क्षण तीनों चुप रहे।

फिर साक्षी ने डायरी खोली।

उसने पहली बार उसे पूरी तरह पढ़ना शुरू किया।

अचानक वह एक पन्ने पर रुक गई।

“यह पहले नहीं देखा मैंने…”

अस्तित्व ने पूछा—

“क्या?”

साक्षी ने पन्ना उसकी ओर बढ़ाया।

उस पर केवल दो पंक्तियाँ लिखी थीं।

“जब तुम्हें यह लगे कि खोज पूरी हो गई है,

तभी समझना कि असली प्रश्न शुरू हुआ है।”

नील ने हल्के आश्चर्य से कहा—

“इसका मतलब?”

अस्तित्व ने धीरे से कहा—

“शायद यही कि जीवन किसी एक उत्तर पर नहीं रुकता।”

साक्षी ने डायरी बंद कर दी।

फिर उसने नदी की ओर देखा।

“नाना कहा करते थे—

मनुष्य अपने जीवन में कई बार जन्म लेता है।”

“कैसे?” नील ने पूछा।

साक्षी ने उत्तर दिया

“जब वह पहली बार सच में कुछ समझता है।”

नदी की हवा अब हल्की गर्म हो गई थी।

अस्तित्व धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरकर पानी के पास चला गया।

उसने अपनी मुट्ठी खोली।

पुराना सिक्का अभी भी उसमें था।

कुछ क्षण वह उसे देखता रहा।

फिर उसने उसे नदी में फेंक दिया।

सिक्का पानी में गिरा

और कुछ ही क्षणों में धारा में खो गया।

नील ने पूछा

“तुमने ऐसा क्यों किया?”

अस्तित्व ने उत्तर दिया

“क्योंकि कुछ चीज़ें हमारे पास रहने के लिए नहीं होतीं।

वे हमें रास्ता दिखाने के लिए होती हैं।”

साक्षी धीरे-धीरे उसके पास आ गई।

“और अब रास्ता खत्म हो गया?”

अस्तित्व ने सिर हिलाया।

“नहीं।

अब रास्ता शुरू हुआ है।”

तीनों घाट की सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।

पीछे मुड़कर देखने पर पीपल का वृक्ष वैसे ही खड़ा था

शांत।

स्थिर।

जैसे उसने यह सब पहले भी देखा हो।

नील ने अचानक कहा

“अगर कोई और भी कभी यहाँ आए…

और वही चिन्ह खोजे?”

अस्तित्व मुस्कराया।

“तो शायद कोई और प्रवासी उसे रास्ता दिखाएगा।”

साक्षी ने धीरे से कहा

“और शायद कोई और कहानी शुरू होगी।”

सूरज अब पूरी तरह उग चुका था।

नदी की धारा चमक रही थी।

तीनों घाट से बाहर निकलकर सड़क की ओर चल पड़े।

कुछ देर बाद वे भीड़ में खो गए।

लेकिन पीपल का वृक्ष

और नदी

वे वहीं रहे।

जैसे वे सदियों से हैं।

क्योंकि मनुष्यों की कहानियाँ समाप्त हो जाती हैं,

पर

खोज कभी समाप्त नहीं होती।

समापन

इस कहानी का वास्तविक अंत यह नहीं है कि रहस्य खुल गया।

बल्कि यह है कि:

अस्तित्व ने अपने प्रश्न को स्वीकार किया

साक्षी ने अपने अतीत को समझा

नील ने यात्रा का अर्थ देखा

और तीनों ने यह जाना

कि जीवन का अर्थ किसी एक उत्तर में नहीं,

बल्कि खोज की प्रक्रिया में छिपा होता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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