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Monday, 16 March 2026

लघु उपन्यास : अस्तित्व और साक्षी - भाग – 3 - अध्याय 18 : आरंभ का रहस्य

 लघु उपन्यास : अस्तित्व और साक्षी - भाग – 3 - अध्याय 18 : आरंभ का रहस्य

रात गहरी हो चुकी थी।

नर्मदा का पानी अब केवल ध्वनि के रूप में मौजूद था

एक स्थिर, प्राचीन ध्वनि, जो मानो समय की गहराई से उठ रही हो।

पीपल के वृक्ष के नीचे चारों लोग खड़े थे।

डायरी अस्तित्व के हाथ में थी।

और वह पुराना सिक्का अभी भी उसकी उँगलियों के बीच चमक रहा था।

कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला।

फिर अस्तित्व ने धीरे से प्रवासी की ओर देखा।

“अब हमें सच बता दीजिए।”

प्रवासी कुछ क्षण शांत रहा।

फिर उसने कहा

“सच कई परतों में होता है।

अगर उसे एक ही बार में खोल दिया जाए,

तो वह कहानी नहीं रह जाता… केवल सूचना रह जाता है।”

नील ने हल्के स्वर में कहा—

“लेकिन हम अब बहुत दूर आ चुके हैं।”

प्रवासी ने सिर हिलाया।

“हाँ।

और शायद इसलिए अब समय आ गया है।”

उसने धीरे-धीरे पीपल के वृक्ष की ओर देखा।

“लगभग तीस साल पहले…

यहाँ एक व्यक्ति आया था।”

साक्षी ध्यान से सुन रही थी।

“वह व्यक्ति इतिहास का विद्यार्थी था।

लेकिन उसे इतिहास से अधिक मनुष्य की चेतना में रुचि थी।”

अस्तित्व ने धीरे से पूछा

“कौन?”

प्रवासी ने उत्तर दिया

“साक्षी के नाना।”

साक्षी की आँखें हल्की-सी फैल गईं।

“नाना… यहाँ आते थे?”

प्रवासी ने कहा

“हाँ।

कई बार।”

नदी की हवा अब ठंडी हो गई थी।

प्रवासी आगे बोला

“उन्हें एक पुरानी पांडुलिपि मिली थी।

उसमें इस नदी के किनारे एक चिन्ह का उल्लेख था।”

उसने अस्तित्व के हाथ में पकड़े सिक्के की ओर देखा।

“यही चिन्ह।”

नील ने पूछा

“इस चिन्ह का अर्थ क्या है?”

प्रवासी ने धीरे से कहा

“यह एक प्रतीक है।”

“किसका?”

“यात्रा का।”

अस्तित्व ने पूछा

“किस यात्रा का?”

प्रवासी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा

“उस यात्रा का जिसमें मनुष्य स्वयं को खोजता है।”

कुछ क्षण की चुप्पी रही।

फिर साक्षी ने धीरे से पूछा

“लेकिन मेरी डायरी… और यह सिक्का…”

प्रवासी मुस्कराया।

“तुम्हारे नाना जानते थे कि कुछ खोजें अकेले पूरी नहीं होतीं।

उन्हें समय चाहिए… और कई लोग।”

नील ने कहा

“इसलिए उन्होंने संकेत छोड़े?”

“हाँ।”

अस्तित्व ने पूछा

“लेकिन मुझे यह सपना क्यों आया?”

प्रवासी ने कुछ क्षण उसे देखा।

फिर उसने शांत स्वर में कहा

“क्योंकि कुछ लोग केवल संकेत नहीं पढ़ते…

वे उन्हें महसूस भी करते हैं।”

नदी की ध्वनि अब और स्पष्ट लग रही थी।

अस्तित्व के भीतर धीरे-धीरे एक बात स्पष्ट होने लगी थी।

“तो यह सब… एक योजना थी?”

प्रवासी ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“फिर?”

“एक प्रयोग।”

साक्षी ने पूछा

“कैसा प्रयोग?”

प्रवासी ने उत्तर दिया

“यह देखने का कि क्या अलग-अलग समय में जन्मे लोग

एक ही प्रश्न से जुड़ सकते हैं।”

नील ने हल्के आश्चर्य से कहा—

“और हम…?”

प्रवासी ने धीरे से कहा

“तुम तीनों उस प्रश्न के उत्तर हो।”

अस्तित्व ने पूछा

“कौन-सा प्रश्न?”

प्रवासी ने नदी की ओर देखा।

फिर कहा

“क्या मनुष्य केवल अपने जीवन तक सीमित है…

या उसकी चेतना समय के पार भी संवाद कर सकती है।”

नदी बहती रही।

साक्षी अब तक चुप थी।

फिर उसने धीरे से कहा

“तो नाना यह सब शुरू करके चले गए?”

प्रवासी ने सिर हिलाया।

“हाँ।

लेकिन उन्होंने एक बात कही थी।”

अस्तित्व ने पूछा—

“क्या?”

प्रवासी ने उत्तर दिया

“अगर कभी तीन लोग इस चिन्ह तक पहुँच जाएँ…

तो समझना कि खोज पूरी हो चुकी है।”

नील ने धीरे से कहा

“और वह तीन लोग…”

प्रवासी ने उनकी ओर देखा।

“तुम हो।”

कुछ क्षण तक कोई कुछ नहीं बोला।

फिर अस्तित्व ने पूछा

“और आप?”

प्रवासी हल्का-सा मुस्कराया।

“मैं केवल एक साक्षी हूँ।”

यह सुनकर साक्षी भी मुस्करा दी।

“तो हम चार नहीं…

तीन ही हैं।”

रात अब और शांत हो गई थी।

अस्तित्व ने डायरी बंद कर दी।

फिर उसने नदी की ओर देखा।

उसके मन में अब वह बेचैनी नहीं थी जो पहले थी।

जैसे कोई लंबा प्रश्न अंततः अपना उत्तर पा चुका हो।

साक्षी ने धीरे से पूछा

“अब क्या?”

अस्तित्व ने कहा

“अब शायद हमें लौट जाना चाहिए।”

नील ने हल्के आश्चर्य से कहा—

“इतनी जल्दी?”

अस्तित्व मुस्कराया।

“कुछ यात्राएँ मंज़िल तक पहुँचने के लिए नहीं होतीं।

 हमें बदलने के लिए होती हैं।”

तीनों कुछ देर तक नदी को देखते रहे।

फिर वे धीरे-धीरे घाट की सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।

पीछे मुड़कर देखने पर पीपल का वृक्ष अंधेरे में स्थिर खड़ा था

जैसे वह इस पूरी कहानी का मौन रक्षक हो।

और नर्मदा की धारा…

वह वैसे ही बहती रही

मानो उसे यह पता हो

कि मनुष्यों की कहानियाँ आती-जाती रहती हैं,

पर खोज हमेशा जारी रहती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

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