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Friday, 6 March 2026

फूल, धूप और तुम्हारी मुस्कान

 फूल, धूप और तुम्हारी मुस्कान


सुबह की हल्की धूप

बगीचे में फैली थी

डहलिया अपने रंगों में नहाए,

हर पंखुड़ी में

रंगों की एक छोटी सी दुनिया।


मैं उनके पास खड़ा रहा

और देखा,

कैसे धूप धीरे-धीरे

पंखुड़ियों पर खेल रही थी।


तभी

तुम याद आ गई

तुम्हारी मुस्कान

कभी धूप की तरह गर्म,

कभी फूल की तरह कोमल,

कभी बाग़ की हवाओं जैसी हल्की।


फूल अपने रंग दिखा रहे थे,

धूप अपनी गर्माहट बिखेर रही थी,

और तुम्हारी मुस्कान

सबसे सुंदर रंग बन गई

जो न आँखों में समा सके,

न शब्दों में।


मैंने महसूस किया

कि बगीचे की हर खुशी

और हर हल्की रौशनी

तुम्हारे बिना अधूरी है।


फूल, धूप

और तुम्हारी मुस्कान

तीनों मिलकर

आज मेरी दुनिया को पूरा कर रहे हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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