एक कमरे में बची हुई मोहब्बत
तुम चली गई थीं
जैसे कोई धूप
धीरे-धीरे खिड़की से उतर कर
कहीं और चली जाए।
कमरे में
अब सिर्फ़ ख़ामोशी है—
मेज़ पर रखा कप,
कुर्सी की हल्की-सी करवट,
और परदे की धीमी हरकत।
मगर इन सबके बीच
कुछ है
जो अब भी ठहरा हुआ है
जैसे तुम्हारी हँसी
दीवारों में हल्की-सी गूँज रही हो,
या हवा में
तुम्हारे होने की
एक महीन-सी आहट बची हो।
शायद
इसी को कहते हैं
एक कमरे में
बची हुई मोहब्बत।
मुकेश ,,,,,,,,
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