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Tuesday, 17 March 2026

एक कमरे में बची हुई मोहब्बत

 एक कमरे में बची हुई मोहब्बत


तुम चली गई थीं

जैसे कोई धूप

धीरे-धीरे खिड़की से उतर कर

कहीं और चली जाए।


कमरे में

अब सिर्फ़ ख़ामोशी है—

मेज़ पर रखा कप,

कुर्सी की हल्की-सी करवट,

और परदे की धीमी हरकत।


मगर इन सबके बीच

कुछ है

जो अब भी ठहरा हुआ है


जैसे तुम्हारी हँसी

दीवारों में हल्की-सी गूँज रही हो,

या हवा में

तुम्हारे होने की

एक महीन-सी आहट बची हो।


शायद

इसी को कहते हैं

एक कमरे में

बची हुई मोहब्बत।


मुकेश ,,,,,,,,

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